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ख़्वाब में आ कर मेरी क़िस्मत जगा दो या नबी / Khwab Mein Aa Kar Meri Qismat Jaga Do Ya Nabi

ख़्वाब में आ कर मेरी क़िस्मत जगा दो, या नबी ! मेरे घर को भी कभी जन्नत बना दो, या नबी ! एक मुद्दत से मेरी आँखें बहुत बेचैन हैं मेरे घर से ये सभी दूरी मिटा दो, या नबी ! फीकी पड़ती जा रही है जाने क्यूँ उस की चमक चाँद को इक बार फिर तलवा दिखा दो, या नबी ! पहले तो पत्थर बना के अपनी गलियों का मुझे और फिर ना'लैन से ठोकर लगा दो, या नबी ! आब-ए-ज़मज़म पी लिया पर प्यास बुझती ही नहीं अपने दस्त-ए-पाक से कौसर पिला दो, या नबी ! ना'त-ख़्वाँ: शुऐब रज़ा वारसी KHwaab me.n aa kar meri qismat jaga do, ya nabi ! mere ghar ko bhi kabhi jannat bana do, ya nabi ! ek muddat se meri aankhe.n bahut bechain hai.n mere ghar se ye sabhi doori miTa do, ya nabi ! pheeki pa.Dti ja rahi hai jaane kyu.n us ki chamak chaand ko ik baar phir talwa dikha do, ya nabi ! pehle to patthar bana ke apni galiyo.n ka mujhe aur phir naa'lain se Thokar laga do, ya nabi ! aab-e-zamzam pee liya par pyaas bujhti hi nahi.n apne dast-e-paak se kausar pila do, ya nabi ! Naat-Khwaan: Shoaib Raza Wa...

ज़िंदगी यूँ तो सब जी रहे हैं मगर इस तरह का हो जीना तो क्या बात है / Zindagi Yun To Sab Jee Rahe Hain Magar Is Tarah Ka Ho Jeena To Kya Baat Hai

ज़िंदगी यूँ तो सब जी रहे हैं मगर इस तरह का हो जीना तो क्या बात है दाएँ बग़दाद हो, बाएँ अजमेर हो सामने हो मदीना तो क्या बात है मुश्क-ओ-'अंबर की भी मुझ को हाजत नहीं 'इत्र की भी मुझे अब ज़रुरत नहीं बा'द मरने के रुख़ पर मलो, दोस्तो ! मुस्तफ़ा का पसीना तो क्या बात है हम चले काश ! घर से जो तयबा नगर हो शुरू' आ'ला हज़रत के दर से सफ़र मेरी माँ की दु'आ हो शरीक-ए-सफ़र आए हज का महीना तो क्या बात है या ख़ुदा ! बस यही इल्तिजा है मेरी कू-ए-सरकार में हाज़िरी हो मेरी फ़ज्र का वक़्त हो और जुम्मे का हो दिन और हो हज का महीना तो क्या बात है है तमन्ना मेरी, आरज़ू है यही काश ! मैं देख लेता जो रू-ए-नबी रश्क करता मुक़द्दर मेरी मौत पर होता शहर-ए-मदीना तो क्या बात है एक ताजुश्शरी'आ हैं रहबर मेरे जिन का साया हमेशा है सर पर मेरे सामने आप के मैं भी हाज़िर रहूँ बा-अदब बा-क़रीना तो क्या बात है इस तरह आ'ला हज़रत का परचम उठे इस तरह आ'ला हज़रत का ना'रा लगे जिस की हैबत से हर दुश्मन-ए-दीन का छूट जाए पसीना तो क्या बात है दीप रौशन हो हर दिल में ईमान का काश ! हर कोई हाफ़िज़ ह...

दुरूदों की शम्मा लबों पर सजाओ | अँधेरा मिटाने हुज़ूर आ रहे हैं / Duroodon Ki Shamma Labon Par Sajao | Andhera Mitane Huzoor Aa Rahe Hain

दुरूदों की शम्मा' लबों पर सजाओ अँधेरा मिटाने हुज़ूर आ रहे हैं उठो, सुन्नियो ! अपने दामन को भर लो मुक़द्दर जगाने हुज़ूर आ रहे हैं ज़रा पढ़ के सल्ले-'अला या मुहम्मद घरों को सजाओ हुज़ूर आ रहे हैं दिल-ओ-जान कर दो सब उन के हवाले कि पलकें बिछाओ हुज़ूर आ रहे हैं सुहानी घड़ी और पिछला पहर है तबस्सुम-ब-दामा वो देखो क़मर है मदीने के ज़र्रो ! सितारों से कहना ज़रा जगमगाओ हुज़ूर आ रहे हैं हिरन क़ैद में रह के इठला रही थी ये कह कह के बच्चों से बलखा रही थी मेरे प्यारे बच्चो ! चलो मुस्कुराओ कि हम को छुड़ाने हुज़ूर आ रहे हैं मु'अत्तर मु'अत्तर फ़िज़ा हो रही है ज़रूर आमद-ए-मुस्तफ़ा हो रही है दुरूदों दु'आओं को पढ़ कर के, लोगो ! मुक़द्दर जगाओ हुज़ूर आ रहे हैं ना'त-ख़्वाँ: अरशद इक़बाल अशरफ़ी शुऐब रज़ा वारसी भदोही महमूद रज़ा मुरादाबादी duroodo.n ki shamma' labo.n par sajaao andhera miTaane huzoor aa rahe hai.n uTho, sunniyo ! apne daaman ko bhar lo muqaddar jagaane huzoor aa rahe hai.n zara pa.Dh ke salle-'ala ya muhammad gharo.n ko sajaao huzoor aa rahe hai.n ...

हुसैन लाजवाब है / Hussain Lajawab Hai

हुसैन ला-जवाब है, हुसैन ला-जवाब है वो कल भी बे-मिसाल था, वो अब भी बे-मिसाल है हुसैन ला-जवाब है, हुसैन ला-जवाब है शब्बीर ! इब्न-ए-हैदर-ए-कर्रार तुम्ही हो जन्नत के नौजवानों के सरदार तुम्ही हो हुसैन ला-जवाब है, हुसैन ला-जवाब है दारा ने बचाया न सिकंदर ने बचाया इस्लाम की 'अज़मत को बहत्तर ने बचाया हुसैन ला-जवाब है, हुसैन ला-जवाब है इक आमिना का लाल और इक फ़ातिमा का लाल नाना भी बे-मिसाल, नवासा भी बे-मिसाल हुसैन ला-जवाब है, हुसैन ला-जवाब है तुम ने कहा, यज़ीद तेरा साथ न दूँगा सर काट ले फिर भी तू मगर हाथ न दूँगा हुसैन ला-जवाब है, हुसैन ला-जवाब है दीन-ए-नबी का क़ाफ़िला-सालार रहेगा सरदार की औलाद है सरदार रहेगा हुसैन ला-जवाब है, हुसैन ला-जवाब है तू क्या समझ रहा है कि सज्दा बचाएगा नाना बचाएँगे या नवासा बचाएगा हुसैन ला-जवाब है, हुसैन ला-जवाब है असग़र ने कहा, दुश्मनों पे वार कीजिए बाबा ! हमारे हाथ में तलवार दीजिए हुसैन ला-जवाब है, हुसैन ला-जवाब है ये ज़िद पे आ गया अगर, टाला न जाएगा बीमार फिर किसी से सँभाला न जाएगा हुसैन ला-जवाब है, हुसैन ला-जवाब है ना'त-ख़्वाँ: शुऐब रज़ा वा...

नबी जी आ रहे हैं / Nabi Ji Aa Rahe Hain

जी करता है आँखें बिछाएँ क़दमों में गिर जाएँ नबी जी आ रहे हैं नबी जी आ रहे हैं कलमा पढ़ती आईं हवाएँ कहने लगी फ़ज़ाएँ नबी जी आ रहे हैं नबी जी आ रहे हैं जन्नत ज़मीं पर है आमद नबी की है जहान में चाँद और सितारों ने नूर बिखेरा आसमान में अपनी शु'आ'एँ आज लुटाएँ खोल के दिल की कलाएँ नबी जी आ रहे हैं नबी जी आ रहे हैं आमिना बीबी की गोदी में माह-ए-ताबाँ आएगा दाई हलीमा के घर में वो मेहमाँ बन के जाएगा डालियाँ सब फूलों की झुक कर लेने लगीं बलाएँ नबी जी आ रहे हैं नबी जी आ रहे हैं आग़ोश-ए-'अब्दुल्लाह रौशन हुई है इक हिलाल से क़ुर्बान हो जाएँ कह दे कोई अब ये बिलाल से जल्दी वो का'बे में आएँ आ कर अज़ाँ सुनाएँ नबी जी आ रहे हैं नबी जी आ रहे हैं असहाब-ए-आ'ला का जिस के लिए दिल बे-क़रार था सलमान-ओ-बू-ज़र को जिस का अभी तक इंतिज़ार था उन से भी जा कर ये कह दो दर-ए-नबी पर आएँ नबी जी आ रहे हैं नबी जी आ रहे हैं ना'त-ख़्वाँ: शुऐब रज़ा वारसी ----------------------------------------------- हूर-ओ-मलाइक झूमें गाएँ अदब से पलकें बिछाएँ नबी जी आ रहे हैं नबी जी आ रहे हैं...

मुझे भी शाहिद-ए-अस्रा बना दिया होता | मेरे ख़ुदा मुझे ऐसा बना दिया होता / Mujhe Bhi Shaahid-e-Asra Bana Diya Hota | Mere Khuda Mujhe Aisa Bana Diya Hota

मेरे ख़ुदा ! मुझे ऐसा बना दिया होता नबी की नक़्श-ए-कफ़-ए-पा बना दिया होता ------------------------------------------------------ मुझे भी शाहिद-ए-अस्रा बना दिया होता नबी की गर्द-ए-कफ़-ए-पा बना दिया होता नबी के शहर को उड़ते हुए पहुँच जाता कि तूने मुझ को परिंदा बना दिया होता बना के मुझ को कबूतर गुफ़ा में रख देता नहीं तो मकड़ी का जाला बना दिया होता सहाबा गिरने न देते ज़मीन पर मुझ को वुज़ू के पानी का क़तरा बना दिया होता हसन-हुसैन मेरे साथ खेलते होते कि मुझ को उन का खिलौना बना दिया होता उधेड़ कर मेरी चमड़ी, ए ख़ालिक़-ए-अकबर ! नबी के पाँव का जूता बना दिया होता जलन से देखते हीरे-जवाहिरात मुझे नबी के शहर का काँटा बना दिया होता बना दी होती जहाँ में सलीम की तारीख़ ख़त उन के हाथ का लिखा बना दिया होता ------------------------------------------------------ मैं उन की राह में कालीन बन के बिछ जाता मुझे हुज़ूर का रस्ता बना दिया होता फ़राग़तों के समर मुझ में रख दिए होते अबू-हुरैरा का बस्ता बना दिया होता शायर: सरदार सलीम ना'त-ख़्वाँ: शोऐब रज़ा वारसी सय्यिद इमरान मुस्तफ़ा हुस्सैनी सैफ़ुल्लाह ख़...

इक न इक दिन ये मद्दाह-ए-ख़ैरुल-बशर नाम अपना ज़माने में कर जाएगा / Ik Na Ik Din Ye Maddaah-e-Khairul-Bashar Naam Apna Zamaane Mein Kar Jaaega

इक न इक दिन ये मद्दाह-ए-ख़ैरुल-बशर नाम अपना ज़माने में कर जाएगा आसमाँ पर उसे ग़ुस्ल देंगे मलक जो नबी की मोहब्बत में मर जाएगा वो रसूलों में, नबियों में मुमताज़ हैं उन को बख़्शे ख़ुदा ने ये ए'जाज़ हैं चल दयार-ए-मदीना में तू सर के बल तेरा बिगड़ा मुक़द्दर सँवर जाएगा कितना बरतर-ओ-बाला है पा-ए-नबी चूमते हैं अदब से जो रूहुल-अमीं जिन के ना'लैन को चूमे 'अर्श-ए-बरीं उन का तलवा कोई क्या समझ पाएगा दस्त-ए-क़ुदरत से जिन की जुदा रूह हुई सय्यिदा फ़ातिमा की है 'अज़मत बड़ी जिन को देखा नहीं है फ़रिश्तों ने भी उन का पर्दा कोई क्या समझ पाएगा इक नवासे की तिश्ना-लबी है अजब या'नी शब्बीर की बंदगी है अजब जो झुके तो क़यामत तलक न उठे ऐसा सज्दा कोई क्या समझ पाएगा देख कर नूर, राजा ये कहने लगा मैं ने ख़्वाजा को पानी किया बंद था क्या पता था कि सागर समा जाएगा उन का कासा कोई क्या समझ पाएगा अहल-ए-सुन्नत के 'उलमा का है फ़ैसला इस सदी के मुजद्दिद हैं अहमद रज़ा छेड़ कर देखो इन का ज़रा तज़्किरा चेहरा-ए-नज्दिया ख़ुद उतर जाएगा सब के मुर्शिद, मेरे तालिब-ओ-राहबर हैं इमाम अहल-ए-सुन्नत के लख़त-ए-जिगर...

चमका जो सब से पहले वो तारा कहूँ तुझे | तज़मीन - सरवर कहूँ कि मालिक-ओ-मौला कहूँ तुझे / Chamka Jo Sab Se Pahle Wo Taara Kahoon Tujhe | Tazmeen of Sarwar Kahun Ki Maalik-o-Maula Kahoon Tujhe

चमका जो सब से पहले वो तारा कहूँ तुझे वज्ह-ए-वजूद-ए-आदम-ओ-हव्वा कहूँ तुझे दुनिया कहूँ कि मक़्सद-ए-दुनिया कहूँ तुझे सरवर कहूँ कि मालिक-ओ-मौला कहूँ तुझे बाग़-ए-ख़लील का गुल-ए-ज़ेबा कहूँ तुझे वो बात मैं कहूँगा जो क़ुरआन ने कही तुझ सा कोई हुआ है न होगा कभी कोई मैं ही नहीं, ये कहता है हर एक उम्मती तेरे तो वस्फ़ 'ऐ़ब-ए-तनाही से हैं बरी हैराँ हूँ, मेरे शाह ! मैं क्या क्या कहूँ तुझे ! चौदह सौ साल हो गए, जारी हैं कोशिशें इस रौशनी को रोक नहीं पाई बंदिशें हर सम्त हो रही हैं अब हिकमत की बारिशें अल्लाह रे ! तेरे जिस्म-ए-मुनव्वर की ताबिशें ए जान-ए-जाँ ! मैं जान-ए-तजल्ला कहूँ तुझे सिद्दीक़ और 'उमर हैं वफ़ा में तेरी शबीह जूद-ओ-सख़ा में तेरी 'अता से ग़नी शबीह क़ुव्वत के बाब में हुए मौला 'अली शबीह ज़हरा है लख़्त-ए-दिल तो हसन है तेरी शबीह ज़ैनब का या हुसैन का बाबा कहूँ तुझे मेरे रज़ा ने, नूर ! क़सीदा वो कह दिया सुनते ही झूम जाते हैं जिस को सभी गदा मुमकिन था जितना लफ़्ज़ों में, वो कह गए रज़ा लेकिन रज़ा ने ख़त्म सुख़न इस पे कर दिया ख़ालिक़ का बंदा, ख़ल्क़ का आक़ा कहूँ तुझे कलाम: इमाम अहमद...

हसरत कहे आँखों की और दिल कहे मस्ताना | तज़मीन - बे-ख़ुद किए देते हैं अंदाज़-ए-हिजाबाना / Hasrat Kahe Aankhon Ki Aur Dil Kahe Mastaana | Tazmeen of Be-Khud Kiye Dete Hain Andaaz-e-Hijabana

हसरत कहे आँखों की और दिल कहे मस्ताना दीवाने की आहों को क्या ठीक है तड़पाना ! मुश्किल हुआ जाता है जज़्बात को समझाना बे-ख़ुद किए देते हैं अंदाज़-ए-हिजाबाना आ दिल में तुझे रख लूँ, ए जल्वा-ए-जानाना ! चौदह सौ बरस पहले छलका था जो पैमाना बग़दाद में, कलियर में उस का है नशा-ख़ाना कहते हैं सभी तेरा है काम करीमाना इतना तो करम करना, ए नर्गिस-ए-मस्ताना ! जब जान लबों पर हो, तुम सामने आ जाना बे-बस को यतीमों को सीने से लगाया है दुनिया ने गिराया था, आक़ा ने उठाया है कहता हुआ इक आशिक़ दरबार में आया है दुनिया में मुझे तुम ने जब अपना बनाया है महशर में भी कह देना ये है मेरा दीवाना ए याद-ए-नबी ! तेरा ग़म हँस के पीए जाऊँ वो दिन न कभी आए, बिन तेरे जिए जाऊँ हर हाल में इक तेरा बस नाम लिए जाऊँ क्या बात हो महशर में, मैं शिकवे किए जाऊँ वो हँस के कहे जाएँ दीवाना है दीवाना कुछ ऐसी सलासत से उल्फ़त से मिले आँखें मग़्मूम मेरे दिल का क़ासिद यूँ बने आँखें दरबार में आक़ा के हर हाल कहें आँखें जी चाहता है दे दूँ तोहफ़े में उन्हें आँखें दर्शन का तो दर्शन हो, नज़राने का नज़राना बटते हैं ज़मीं पर जो सदक़े हैं इसी दर के ...